सम्पादकीय
समूचा विश्व कोविड 19 से पीड़ित मनुष्य अपने ही घरो में कैद होने को विवश है बुद्धिजीवी इसे प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम बता रहे हैं। कोविड 19 ने महामारी का विकराल रूप ले लिया है इससे बचने के लिए सरकार लॉक डाउन करने के कठोर निर्णय लेने पर विवश है मानव जाति को बचाना है अपने देश के लोगो को बचाना है तो यही एक उपाय है । वास्तव में यह यथार्थ सत्य है कोविड19 का कोई इलाज हमारे वैज्ञानिक नही खोज पाए है। डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ जान पर खेल कर इस महामारी से लोगो को बचाने का प्रयास कर रहे है जिनका शरीर रोगों से लड़ने में सक्षम ही वही जिंदा लॉट पा रहे है और जो बीमारियों से पूर्व से ही पीड़ित है अंदरूनी शक्ति कमजोर है उनका बचना असम्भव सा है।
देश और समूचा विश्व एक भयावह स्थिति से गुजर रहा है यहां अब वह सब हो रहा है जिसकी कल्पना भी कभी नही की गई थी।
मानव निर्मित मशीनरी रेल , हवाईजहाज, चार पहिये, दो पहिये वाहन सब बंद पड़े हैं , बड़ी बड़ी बिल्डिंग व्यवसायिक भवन खाली पड़े है लंबी चौड़ी सड़के जहाँ चलना भी मुश्किल होता था वहां आज श्वान आराम फरमा रहे हैं ।
वह मानव जो अपनी कामयाबी पर इतराता था वह महामानव जो अपनी शक्ति पर अभिमान करता था वह भी अब घर मे बन्द होकर जान बचाने को मजबूर है। यह इस ओर इंगित करता है समय बहुत बलवान होता है । सब बेबस है आज।
परंतु यदि इस संकट से बाहर निकलना है तो इस सबको सकारात्मक लेना होगा लॉक डाउन में जो समय आपको मिला है वह कभी मिलना संभव नही था बुद्धिजीवियों का कहना है यह बेहतर समय है खुद को समझने का और निखारने का । यह बेहतर समय है अपने अंदर झांकने का यह देखने का अब तक आपने अपने जीवन मे क्या सही किया क्या गलत किया । आने वाले समय मे अवसर मिलने पर गलतियों को सुधारने के लिए तैयार रहना चाहिए।
यह समय है कमजोर लोगो के काम आने का , हमारे आसपड़ोस में जो इस संकट में फसे हुए है शर्म व झिझक से अपनी समस्या नही बता पा रहे यदि आप थोड़ा भी जानते है ऐसे लोगो की मदद कीजिये । मानवता को जिंदा रखिये । स्वयम मदद करिये या शासन प्रशासन स्वयम सेवी संस्थाओं से सहायता लीजिये।
अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए , आप समाज की धरोहर है आपके परिवार को, समाज को देश को आपकी जरूरत है।
संतुलित आहार लीजिये योग , ध्यान भी करिये समय का सदुपयोग होगा। जिस फील्ड में आप कार्य कर रहे है ज्ञानार्जन कीजिये।
सरकार द्वारा दिये जा रहे दिशा निर्देशों का पालन करिये और प्रयास करिये कि सरकार के संदेशों दिशा निर्देशों को जान जान तक पहुंचाए लोगो को जागरूक करें सोशल मीडिया का सदुपयोग करें ।घर से बाहर ना निकले ना निकलने दें ।इसी में हम सब की भलाई है।
पंडित मृदुल शर्मा
प्रधान संपादक
#लॉकडाउन
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भौतिक आइसोलेशन भी आवश्यक है।*
यदि आप चलते रहना चाहते हैं तो एक मोड़ पर रुकना जरूरी है।भागदौड़, आपाधापी की जिंदगी में मशगूल मानवजाति में एक वैचारिक ठहराव आवश्यक है। यदि यह ठहराव मानव स्वयं निर्धारित नहीं करता तो प्रकृति स्वयं निर्मित कर देती है। ऐसा ही एक ठहराव सम्मुख आ खड़ा हुआ है। आलीशान बंगला, हवाई सफर, ऐशो आराम की जिंदगी सब कुछ एक महीन से एक वायरस की गिरफ्त में है। दौलतमंद, जरूरतमंद सभी बराबर से कैद हैं। सबकी मानसिकता, सबकी विवशता एक जैसी है।भौतिकता की प्यास बुझ सी गई है। जितनी आकुल प्यास है उतना सुकून पानी में नही है। सब कुछ बदल सा गया है। तमाम जुगत हो रही है जिंदगी बचाने की। दानदाताओं की फहरिस्त लंबी होती जा रही है, सेवाभावी हाथ दिन रात समान संवेदनाओं के साथ खड़े है, चप्पे चप्पे पर तमाम बन्दोबस्त जीवन रक्षा के लिए। कुछ ठहर गए हैं लेकिन कुछ हैं जो अब भी बहक रहे हैं। यह लॉकडाउन है।
मानव जाति के लिए प्रकृति का यह एक सबक है। प्रकृति के लिए सब समान है। प्रकृति सबको देती भी बराबर है और सबसे बराबर वसूलती भी है। भागो, दौड़ो पर इतना भी नही कि प्राकृतिक संतुलन का ख्याल न रहे। रिश्तों की दूरियों का आभास न हो। सामाजिक दूरियां मखौल बनकर रह जाएं। आत्ममुग्धता और भौतिकवाद का नशा सब कुछ विध्वंस कर सकता है। जो शुरू हुआ है उसका अंत भी है और सबका समय निश्चित भी होता पर कई बार हम अपनी ही मानसिक निर्घिन्नता के शिकार होजाते हैं। प्रकृति कई बार मौके देती है पर हम अपने अल्लहड़पन से बाज नही आते। आर्थिक, भौतिक, सामाजिक दिखावे की अंधी होड़ हमे लगातार पंगु बना रही होती है, किन्तु हमे आभास नही होता। ऐसे ही समय में प्रकृति एक ठहराव कायम करने की कोशिश करती है और यह ठहराव पुनर्निर्माण में सहायक होता है, ऐसा ठहराव जहां से एक मार्ग प्रशस्त होता है। एक निश्चित समय बाद जब हम कुछ देर ठहरते हैं तो हमे भले-बुरे का भान होता है। हम खामियां तलाश कर, उनमें सुधार कर पुनर्सृजन कर पाते हैं।
भौतिक शरीर निरंतर विकासोन्मुखी है, जो उचित भी है, किन्तु मन चंचल है मन का रुकना आवश्यक है। मानवीय संवेदनाओं के पल्लवन के लिए, प्राकृतिक आकर्षण की जीवंतता के लिए, अनुकूलता-प्रतिकूलता में सामंजस्य के लिए ठहराव जरूरी है।
जन्म के साथ ही हमारी यात्रा शुरू हो जाती है, चलना ही जीवन है। चलिए अथक चलिए किन्तु चित्त स्थिर रखिये और कोई तो मोड़ निर्धारित कीजिए जहां कि पड़ाव लिया जाए।
शहर में सन्नाटा है। सब कुछ स्थिर सा हो गया है किन्तु बाग-बगीचों में हरियाली है, पक्षी उड़ान भर रहे हैं, जीव-जंतुओं की चहलकदमी जारी है। हवा,जल,अनल कृतज्ञ हैं। कौन विवश है?...मानव। हाँ सिर्फ मानव।
स्थिरता मौलिक आवश्यकता है। शारीरिक आईसोलेशन के साथ भौतिक आइसोलेशन भी जरूरी है। सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक विकास की अंधी होड़ ऐसे ही कीट पतंगों को जन्म देते हैं जो पल भर में दुनिया पर हावी होकर अट्टहास करते है और विलासिता मजबूर ।
सीमा घोष


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