बुधवार, 15 अप्रैल 2020

भगवान कृष्ण के रोल के लिए जब नीतीश भारद्वाज जी को चुना गया ।



कृष्ण काफी चंचल, नटखट स्वाभव के रहे। जब उन्हें कोई कार्य रास न आता। या उस कार्य के परिणाम भविष्य में कोई जटिल समस्या उतपन्न न कर दे। कृष्ण उसका तोड़ अवश्य निकाल लेते।
     याद हो! गांधारी ने पुत्र दुर्योधन को भीम के साथ युद्ध से पहले नग्न अवस्था मे सुबह सुबह अपने कक्ष में बुलाया था। तब कृष्ण ने स्थिति को भांपकर जंघा वाला तोड़ निकाल लिया था।
     गजेंद्र चौहान बड़े खुश होकर बीआर चोपड़ा स्टूडियो से घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे। बाकई गजेंद्र काफी खुश थे। क्योंकि उन्हें उनके मनमाफिक काम मिल चुका था। परन्तु कृष्ण को यह कतई रास न आ रहा था। गजेंद्र स्टूडियो से कुछ दूरी पर पहुँचे ही थे। कि कृष्ण।
      "हे! गजेंद्र इतने खुश होकर, मग्न हुए। कहाँ दौड़े जा रहे हो। कृष्ण ने पूछा।"
"चूंकि गजेंद्र चौहान काफी खुश थे। तो उन्होंने तपाक से कहा कि घर की ओर जा रहा हूँ। मुझे मेरा पसंदीदा किरदार मिल गया है। जिसे निभाने की मुझे प्रबल इक्छा थी"
"कृष्ण तो सब जानते थे। परन्तु उन्होंने अनजान रहते हुए। पूछा कि हे! पुरुष कौनसा किरदार"
"कृष्ण ने अपना सवाल खत्म नहीं किया था कि"
"गजेंद्र उतावलेपन में बोले, "श्रीकृष्ण"।
"ओह्ह! कृष्ण, अद्भुत गजेंद्र। बाकई अद्भुत। परन्तु कृष्ण का व्यक्तित्व तो काफी विशाल है। तुम अपने कंधों पर उठा पाओगे। उनके व्यक्त्वि का भार सह पाओगे। कृष्ण ने पासा फेंक दिया था"
गजेंद्र कृष्ण के भाव को टालते हुए आगे निकल गए।        लेकिन कृष्ण ने जो करना था। कर चुके थे। दरसअल कृष्ण का दिल डॉक्टर नीतीश भारद्वाज की मोहिनी मुस्कान पर आ चुका था। नीतीश भी इस स्टूडियो में आए थे। लेकिन काका विदुर से मिलने। परन्तु नीतीश की काका विदुर से मुलाकात कुछ खास न रही थी। लेकिन नीतीश को देखते ही, कृष्ण अपना मन बना चुके थे। कि पार्थ के रथ का सारथी नीतीश से उत्तम कोई दूजा नही हो सकता है। वही चंचलता, वही हाजिर जबाबी, मुख पर विराजमान मोहिनी मुस्कान के साथ खिलता हुआ चेहरा। अद्भुत वाक्पटुता। बिल्कुल भगवद गीता के शब्दों को अच्छे से कौन्तेय को समझाने में कुशल। कृष्ण नीतीश को अच्छी तरह पहचान चुके थे।
       इधर गजेंद्र कृष्ण के व्यक्त्वि का भार सहने की खातिर बहुत वजन बढ़ा चुके थे। कृष्ण ने जो पासा फेंका था। बिल्कुल सटीक बैठा। क्योंकि कृष्ण को नीतीश की दरकार थी। लेकिन कृष्ण चाहते, तो बीआर चोपड़ा, रवि चोपड़ा, गुफी पेंटल को बता सकते थे। परन्तु कृष्ण के हर कृत्य में नटखट लीला छिपी रहती है।
       गजेंद्र कृष्ण के लिए स्टूडियो आए। कुछ कृष्ण दृश्य किए। लेकिन गजेंद्र काफी मोटे नजर आ रहे थे। इसे देख रवि चोपड़ा ने गजेंद्र से कृष्ण का किरदार वापस ले लिया। क्योंकि रवि को कृष्ण के लिए आकर्षक व्यक्त्वि वाला चेहरा चईये था। जिसे देख, चेहरे खिल उठे। क्योंकि कृष्ण तो नटखट लीलाओं के लिए जाने जाते थे। फिर क्या! मोटे गजेंद्र रूपी कृष्ण को रवि चोपड़ा ने कृष्ण की बुआ कुंती का जेष्ठ पुत्र युधिष्ठिर के पास जाने का सुझाव दिया। अब आखिरकार गजेंद्र को यह सुझाव मानना था।
         इस तरह श्रीकृष्ण ने नीतीश भारद्वाज को मथुरा,गोकुल, और हस्तिनापुर के लिए आमंत्रित किया। और श्रीकृष्ण ने नीतीश से कहा "हे! मोहिनी मुस्कान के धनी व्यक्त्वि, तुम्हें मेरे व्यक्त्वि का भार लेकर कुरुक्षेत्र की ओर जाना है। मुझे तुम पहली भेंट में ही भा गए थे। परन्तु उस दौरान तुम काका विदुर के घर मे थे। इसलिए मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया। हे! नौजवान तुम्हें कुरुक्षेत्र युद्ध मे कोई अस्त्र नही उठाना है। सिर्फ तुम्हे अर्जुन का सारथी बन उसे धर्म/अर्धम का बोध कराना है। क्योंकि अवश्य ही पांडु पुत्र अर्जुन राह से भटक सकते है। और भटकेंगे। सामने जाने-पहचाने चेहरे देखकर। मुझे तुम्हारे कंधो पर पूर्ण विश्वास है। कि तुम्हारे कंधे पांडवो और कौरवों के बीच धर्म/अधर्म के बीच युद्ध को उठाए रखेंगे। हे! नीतीश याद रहे। धर्म युद्ध मे सब जायज है। मैं तुम्हे अपनी बुआ कुंती के पांचों पुत्रो की ज़िम्मेदारी सौप रहा हूँ। इनको राह दिखाओ केशव। अर्जुन का सारथी बनने का प्रस्ताव स्वीकार करो"।
            "हे प्रभु। आप मुझे आदेश दे। प्रस्ताव देकर मुझे लज्जित न करे। मैं तुच्छ मनुष्य कृतज्ञ हो चला हूँ। कि आपने मुझे महाभारत का सूत्रधार बनाया। और इतने विशाल कृष्ण व्यक्त्वि का भार मेरे कंधो पर दिया। मैं आपको यकीन दिलाता हूं। कि मेरा पूर्ण प्रयास रहेगा। कि आपके व्यक्त्वि का रत्ती भर भार सह सकुँ" नीतीश भारद्वाज ने भरे हुए गले से कहा।
             "तथास्तु..... सारथी। जाओ धर्म को विजयी भव का आशीर्वाद दो"
"प्रभु! आशीर्वाद तो आप का चईये" नीतीश ने चौकते हुए कहा।
"हे! नीतीश जब तुम मेरे स्वरूप में आओगे। तब तुम्हे ही भारत वर्ष में जनता जनार्दन को आशीर्वाद देना है। क्योंकि तुम मेरा चेहरा बनोगे। मेरे अंश तुम्हारे अंदर नजर आएंगे। लोग तुम्हें काफी प्यार देंगे। तुम कृष्ण के रूप में ही जाने जाओगे। ख्याति तुम्हारा इंतज़ार कर रही होगी "
"प्रभु! मैं काफी धन्य हो गया। आपने बाकई मुझ पर बहुत बड़ा भार रख दिया। काफी ज़िम्मेदारी पूर्ण भार है।"

फिर क्या नीतीश भारद्वाज ने श्री कृष्ण के व्यक्त्वि को पेश करने का प्रयास किया। इस प्रयास को देख। भारत वर्ष में लोग दीवाने हो चले।
          नीतीश की मोहिनी मुस्कान ने सबका मन मोह लिया।

✍ ओम लवानिया

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