स्त्री तंत्र की व्याख्या
द्वितीय अध्याय:_ ( प्रकृति आज भी स्त्री तंत्र पर विद्यमान है)
प्रकृतिक नियमों में मादा अधिकार होता है अपना साथी चुनने का। यह मैं पहले भी कह चुकी हूं। हम यह भी कह सकते हैं कि प्राकृतिक नियमों के अनुसार नर मादा का सहचरी होता है, परंतु दुर्भाग्यवश मानवीय परिधि में पुरुष प्रधान समाज के अस्तित्व के निर्धारण के लिए मादा को नर का सहचरी बना दिया गया है। इस प्राकृतिक नियम के उलट जाने के कारण ही संसार में व्यवस्थाएं उलट-पुलट हो रही है।
अगर प्राकृतिक नियमों के अनुसार मादा को निर्णय लेने का अधिकार है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि निर्णायक क्षमता मादा में नर से अधिक होती है और मानवीय परंपराओं के अनुसार मादा यानी स्त्री जाति को निर्णय करने का अधिकार ही नहीं। उसे अपने पति की सह गामिनी बनकर ही चलना पड़ता है।
प्राकृतिक नियमों से छेड़छाड़ कर हम अपनी व्यवस्थाओं को कुछ काल के लिए अपने अनुसार चला सकते हैं परंतु एक हद के बाद भी विनाश की ओर जाती हैं।
कल मैंने चर्चा की थी कि किस प्रकार भगवान शिव शंकर और माता सती ने अपनी लीलाओं में हिंदू धर्म के सार को दर्शाया आज इसका एक उदाहरण और प्रस्तुत कर रही हूँ भगवान शंकर जी और गौरा यानी माता पार्वती की लीलाओं के रूप में।
माता पार्वती के इस जन्म में जब क्रोध युक्त होकर वे प्रचंड रुप धारण करतीं हैं तब शंकर जी अपने आप को उनके चरणों में अर्पण कर उनके क्रोध को शांत करते हैं, जो यह बात दर्शाता है कि अपनी पत्नी के क्रोध करने पर कभी भी उसे मारपीट कर, बाल खींच कर उसकी औकात दिखाने की हैसियत बताने की कोशिश ना करें बल्कि उसके आगे अपने आप को निछावर कर उसके प्रति प्रेम का प्रदर्शन करें क्योंकि नारी पर हाथ उठाना या नारी को उसकी औकात याद दिला कर सबक सिखाना हमारे धर्म में नहीं। हमारा धर्म नारी सम्मान की विशेषता पर आधारित है वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन स्त्री के क्रोध को प्रेम पूर्वक ही शांत किया जाना चाहिए यही हमारे हिंदू धर्म की विशेषता है
प्राचीन काल में जब परिवार प्रथा की स्थापना हुई तब साथ साथ वेश्या कुल की भी उत्पत्ति हुई जो पुरुष द्वारा अलग-अलग शरीर को चूमने की वृत्ति के कारण हुई जिसके चलते अपनी इस चाहत और हवस को वेश्या कुल की आड़ में पुरुष वर्ग ने खूब जिया। यहां यह देखना भी बहुत जरूरी है की परिवार संस्था से सबसे पहले कदम पुरुष वर्ग ने ही बाहर निकाले थे और आज जब लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा को अपनाया जा रहा है तो उसे रोक न पाने की कुंठा में संस्कारों की दुहाई देता है यह पुरुष वर्ग। परिवार प्रथा से कदम भार निकालते वक्त जिस स्वच्छंदता और स्वतंत्रता का ज्ञान उसे अपने लिए नहीं रहा, वह ज्ञान स्त्री पर बघारता है स्वच्छंदता और स्वतंत्रता के अंतर के रूप में।
यहां एक बात गौर करने लायक है कि लिव इन रिलेशनशिप में नियम है कि दोनों स्त्री और पुरुष सहमति से एक साथ रहते हैं पर नियम वही है प्राकृतिक। यदि मादा राजी है तो लिव इन रिलेशनशिप की ओर अग्रसर होता है रिश्ता और इसके नियम भी प्राकृतिक है यदि पुरुष मादा का सहचरी बनकर रहता है तब मादा उसे स्वीकार करती है अन्यथा त्याग कर देती है। यही नियम पशु पक्षियों में जानवरों में है जो की प्राकृतिक नियम कहलाता है। और यही वैदिक काल का हिंदू धर्म नियम भी है जो अध्ययन करने पर ज्ञात होता है प्रमाण स्वयंवर और पति त्याग की प्रथा का प्रचलित होना।
इसलिए जो लोग इस अवधारणा से ग्रसित है कि हमारी भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य है प्रभाव पड़ रहा है, वह अपने आंख और कान खोलकर सुन ले तथा देख ले की यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव नहीं है बल्कि हमारा पारिवारिक समाज एक बार फिर उसी जगह जा रहा है जहां से वह चला था क्योंकि यह नियम मानव द्वारा बनाए गए थे वह भी पुरुष वर्ग द्वारा क्योंकि पुरुष प्रधान समाज के अस्तित्व के निर्धारण में मानव यह भूल गया कि प्रकृति को छिपाया जा सकता है लेकिन लुप्त नहीं किया जा सकता प्रकृति अपने नियम के साथ अपने अस्तित्व में आ ही जाती है।
स्त्री जाति का एक स्वाभाविक गुण है जहां उसे सम्मान मिलता है वहाँ वह समर्पण करती है यदि वास्तव में पारिवारिक निधि की रक्षा करना चाहते हैं और चाहते हैं कि यह यथावत चलती रहे तो अपनी जीवन संगिनी का सम्मान कीजिए वह आप के प्रति अपना समर्पण कभी नहीं त्यागेगी क्योंकि यह उसका स्वाभाविक गुण है।
द्वितीय अध्याय:_ ( प्रकृति आज भी स्त्री तंत्र पर विद्यमान है)
प्रकृतिक नियमों में मादा अधिकार होता है अपना साथी चुनने का। यह मैं पहले भी कह चुकी हूं। हम यह भी कह सकते हैं कि प्राकृतिक नियमों के अनुसार नर मादा का सहचरी होता है, परंतु दुर्भाग्यवश मानवीय परिधि में पुरुष प्रधान समाज के अस्तित्व के निर्धारण के लिए मादा को नर का सहचरी बना दिया गया है। इस प्राकृतिक नियम के उलट जाने के कारण ही संसार में व्यवस्थाएं उलट-पुलट हो रही है।
अगर प्राकृतिक नियमों के अनुसार मादा को निर्णय लेने का अधिकार है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि निर्णायक क्षमता मादा में नर से अधिक होती है और मानवीय परंपराओं के अनुसार मादा यानी स्त्री जाति को निर्णय करने का अधिकार ही नहीं। उसे अपने पति की सह गामिनी बनकर ही चलना पड़ता है।
प्राकृतिक नियमों से छेड़छाड़ कर हम अपनी व्यवस्थाओं को कुछ काल के लिए अपने अनुसार चला सकते हैं परंतु एक हद के बाद भी विनाश की ओर जाती हैं।
कल मैंने चर्चा की थी कि किस प्रकार भगवान शिव शंकर और माता सती ने अपनी लीलाओं में हिंदू धर्म के सार को दर्शाया आज इसका एक उदाहरण और प्रस्तुत कर रही हूँ भगवान शंकर जी और गौरा यानी माता पार्वती की लीलाओं के रूप में।
माता पार्वती के इस जन्म में जब क्रोध युक्त होकर वे प्रचंड रुप धारण करतीं हैं तब शंकर जी अपने आप को उनके चरणों में अर्पण कर उनके क्रोध को शांत करते हैं, जो यह बात दर्शाता है कि अपनी पत्नी के क्रोध करने पर कभी भी उसे मारपीट कर, बाल खींच कर उसकी औकात दिखाने की हैसियत बताने की कोशिश ना करें बल्कि उसके आगे अपने आप को निछावर कर उसके प्रति प्रेम का प्रदर्शन करें क्योंकि नारी पर हाथ उठाना या नारी को उसकी औकात याद दिला कर सबक सिखाना हमारे धर्म में नहीं। हमारा धर्म नारी सम्मान की विशेषता पर आधारित है वजह चाहे कुछ भी हो लेकिन स्त्री के क्रोध को प्रेम पूर्वक ही शांत किया जाना चाहिए यही हमारे हिंदू धर्म की विशेषता है
प्राचीन काल में जब परिवार प्रथा की स्थापना हुई तब साथ साथ वेश्या कुल की भी उत्पत्ति हुई जो पुरुष द्वारा अलग-अलग शरीर को चूमने की वृत्ति के कारण हुई जिसके चलते अपनी इस चाहत और हवस को वेश्या कुल की आड़ में पुरुष वर्ग ने खूब जिया। यहां यह देखना भी बहुत जरूरी है की परिवार संस्था से सबसे पहले कदम पुरुष वर्ग ने ही बाहर निकाले थे और आज जब लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा को अपनाया जा रहा है तो उसे रोक न पाने की कुंठा में संस्कारों की दुहाई देता है यह पुरुष वर्ग। परिवार प्रथा से कदम भार निकालते वक्त जिस स्वच्छंदता और स्वतंत्रता का ज्ञान उसे अपने लिए नहीं रहा, वह ज्ञान स्त्री पर बघारता है स्वच्छंदता और स्वतंत्रता के अंतर के रूप में।
यहां एक बात गौर करने लायक है कि लिव इन रिलेशनशिप में नियम है कि दोनों स्त्री और पुरुष सहमति से एक साथ रहते हैं पर नियम वही है प्राकृतिक। यदि मादा राजी है तो लिव इन रिलेशनशिप की ओर अग्रसर होता है रिश्ता और इसके नियम भी प्राकृतिक है यदि पुरुष मादा का सहचरी बनकर रहता है तब मादा उसे स्वीकार करती है अन्यथा त्याग कर देती है। यही नियम पशु पक्षियों में जानवरों में है जो की प्राकृतिक नियम कहलाता है। और यही वैदिक काल का हिंदू धर्म नियम भी है जो अध्ययन करने पर ज्ञात होता है प्रमाण स्वयंवर और पति त्याग की प्रथा का प्रचलित होना।
इसलिए जो लोग इस अवधारणा से ग्रसित है कि हमारी भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य है प्रभाव पड़ रहा है, वह अपने आंख और कान खोलकर सुन ले तथा देख ले की यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव नहीं है बल्कि हमारा पारिवारिक समाज एक बार फिर उसी जगह जा रहा है जहां से वह चला था क्योंकि यह नियम मानव द्वारा बनाए गए थे वह भी पुरुष वर्ग द्वारा क्योंकि पुरुष प्रधान समाज के अस्तित्व के निर्धारण में मानव यह भूल गया कि प्रकृति को छिपाया जा सकता है लेकिन लुप्त नहीं किया जा सकता प्रकृति अपने नियम के साथ अपने अस्तित्व में आ ही जाती है।
स्त्री जाति का एक स्वाभाविक गुण है जहां उसे सम्मान मिलता है वहाँ वह समर्पण करती है यदि वास्तव में पारिवारिक निधि की रक्षा करना चाहते हैं और चाहते हैं कि यह यथावत चलती रहे तो अपनी जीवन संगिनी का सम्मान कीजिए वह आप के प्रति अपना समर्पण कभी नहीं त्यागेगी क्योंकि यह उसका स्वाभाविक गुण है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें