शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

स्त्री तंत्र की व्याख्या - दीपिका माहेश्वरी , बिजनोर

स्त्री तंत्र की व्याख्या


प्रथम अध्याय:_ महादेव शिव शंकर और आदि शक्ति की लीलाओं में स्त्री के महत्व का वर्णन


यह तो बचपन से ही पता था कि माता सती के योग अग्नि में विलीन हो जाने के कारण भगवान शिवशंकर जी के दो विवाह संपन्न हुए परंतु पूरे वृत्तांत का ज्ञान रामचरितमानस के अध्ययन के बाद प्राप्त हुआ।

इसलिए आज इस विषय पर अपने कुछ व्याख्या रखना चाहती हूं। श्रीरामचरित्र मानस की व्याख्या के अनुसार जब माता सती में श्री राम की परीक्षा सीता मैया का रूप धारण कर के ली तब भगवान शिव शंकर ने व्यथित होकर माता सती का त्याग दिया और समाधि में लीन हो गए। इस प्रकरण की व्याख्या कुछ इस प्रकार की गई की माता सती में सीता मैया का रूप धारण किया इस वजह से भगवान शिव सती माता से क्रुद्ध हो गए और उनका त्याग कर दिया। परंतु सत्यता यह है कि सती माता ने उनके आराध्य प्रभु श्री राम की परीक्षा ली इस बात में उन्हें इतना व्यथित किया कि उन्होंने सती माता को अपने आप से विलग कर दिया न कि सीता माता का मूर्त रूप धर लेने की वजह से शिव शंकर ने उनका त्याग किया

दोनों विचारों में जमीन आसमान का अंतर है लेकिन प्राथमिकता इसी बात को दी गई की सती ने सीता माता का रूप धारण कर पतिव्रत धर्म का खंडन किया क्योंकि हमेशा व्याख्या पुरुष समाज द्वारा की गई और अपने पुरुष प्रधान तत्व को ऊपर रखने के लिए अपनी सोच से ही व्याख्या करते आए जिसके चलते उनमें हठधर्मिता के दोष को दर्शाया गया यह भूल कर की आदिशक्ति हर दोष से रहित हैं।

जिस विचारधारा से स्वयं मां जगदंबा दोष युक्त हो रही हों, वह विचारधारा कितनी और कहां तक सही है? इसका मूल्यांकन ऐसी विचारधारा के पक्षधर विचारधारा का अवलोकन कर स्वयं करें।

 जब राजा दक्ष ने महायज्ञ में संपूर्ण संसार के देवी देवताओं को आमंत्रित किया सिवाय भगवान शिव और माता सती के। तब भगवान शंकर को यह भली-भांति ज्ञात था की माता सती अपने पिता द्वारा उनका अपमान बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी इसलिए ही उन्होंने माता सती के सामने यह विचार रखा कि जहां से आमंत्रण ना आए उस आयोजन में किसी को जाना नहीं चाहिए। यह एक बहुत ही उच्च कोटि का सदाचारी विचार व्यक्त किया गया था भगवान शिव शंकर द्वारा जिसे पुरुष प्रधान समाज ने नियम की तरह स्त्री जाति पर लाद दिया कि बिना पति की मर्जी के वे अपने मैके की ओर प्रस्थान ना करें। दोनों ही दृष्टिकोण में जमीन आसमान का अंतर है

यदि गौर किया जाए तो हमारी विवाह पद्धति वचनों से प्रतिबद्ध है जिसमें लिए गए सातों वचनों का एक समान महत्व है। एक की भी प्रतिबद्धता नष्ट होने पर विवाह बंधन के कोई मायने नहीं रहते लेकिन पुरुष प्रधान समाज ने वही वचन नियम की तरह गाय सुनाएं और समाज में रमाए जो उन के अस्तित्व के लिए जरूरी थे।

बात यह कही गई थी कि कहीं भी आयोजन हो बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए उसे यह नियम बनाकर लागू कर दिया गया की पत्नी को पति की मर्जी के बगैर अपने मायके भी नहीं जाना चाहिए। जिसके चलते हम यह वचन भूल बैठे हैं जो पति द्वारा पत्नी को दिया जाता है फेरों के समय कि आज से मैं तुम्हारे मां-बाप का सम्मान अपने माता पिता की भांति करूंगा पुत्र की तरह उनकी इज्जत करूंगा। अगर इस वचन के परिपेक्ष में विवाह पद्धति को कसा जाए तो 90% विवाह खंडित ही कहलाएंगे क्योंकि आज के माहौल में वधू पक्ष के माता पिता को भरपूर रूप से अपमानित किया जाता है और यदि इस वचन का खंडन होता है तब स्त्री को अन्य किसी वचन को निभाने की आवश्यकता ही नहीं वह बिना इजाजत के अपनी मर्जी से अपने माता-पिता से मिलने जा सकती है क्योंकि विवाह बंधन तो वचन की टूटने पर पहले ही खंडित हो चुका है।
यूं तो निभाने के लिए सारी उम्र निभाई जाती हैं शादियां
सच तो यह है झूठ के सापेक्ष में बढ़ाई जाती हैं आबादियाँ

 कहीं पढ़ा कि "स्त्री प्रेम पीकर जीती है।" यह पंक्ति अपने आप में यथार्थ पूर्ण सत्य है और इस पंक्ति को किसी *रूपम मिश्र* ने लिखा है। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है। इस पंक्ति का चित्रण महाकाल महा शिव और आदि शक्ति जगदंबा ने शिव शंकर और सती के रूप में अपने जीवन लीलाओं में प्रदर्शित किया, जिसकी व्याख्या कभी की नहीं गई।

जब शिव शंकर महादेव ने दुख की भावना में व्याप्त होकर माता सती को श्री राम की परीक्षा लेने के कारण अपने आप से विलग किया और उसके उपरांत अपने पिता के द्वारा भी बहिष्कृत करने पर उनके जीवन से प्रेम की समाप्ति उन्हें योग अग्नि में विलीनता के कागार पर ले आई और उन्होंने अपनी जीवन लीला को योग अग्नि में विलीन कर दिया। उसके पश्चात महादेव उनके मोह में उनके योग विलीन शरीर को लेकर कई दिनों तक दुख की छाया वृत्ति में बिरह अग्नि में जलते रहे, तब भगवान विष्णु ने उन्हें मोह से निकालने के लिए सती माता के शरीर को अपने चक्र द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया। जिससे उनका शरीर 51 भागों में यत्र तत्र बिखर गया और जहां जहां उनका शरीर पृथ्वी पर गिरा वहाँ पर आदिशक्ति का सिद्ध पीठ स्थापित हो गया।

इस पूरे प्रकरण में एक बात बहुत गौर करने की है कि जब महा तपस्वी महायोगी शिव शंकर जी माता सती के मोह में दुख और विरह से तड़प कर उनकी शरीर का मोह नहीं छोड़ पाए तब माता सती जो राजा दक्ष के यहां जन्मी पली बड़ी वे अपने पिता द्वारा बहिष्कार किए जाने पर भावनाओं के वशीभूत हो अपने पिता से प्रश्न करने उनके द्वार पर गई तब उन्हें हठधर्मिता का आवरण क्यों पहना दिया गया यह बात मेरे समझ से परे है... शायद इसलिए पुरुष प्रधान समाज का अस्तित्व नारी को दोषारोपण करने पर ही टिका है।

भगवान शंकर के मोह का विवेचन आज तक किसी ने नहीं किया क्योंकि वह पुरुष प्रधान समाज के अस्तित्व के लिए जरूरी नहीं था शंकर जी की इस लीला का एक पक्ष यह भी है कि जो पुरुष अपने दुख और व्यथित मन के वशीभूत हो किसी भी परिस्थिति में अपनी पत्नी का त्याग करता है वह दुख का भागी होता है यही हमारे हिंदू धर्म का सार है क्योंकि हिंदू धर्म में नारी त्याग पाप के समान माना गया है और जो अपनी नारी का त्याग करता है वह दुख का भोगी होता है चाहे वजह कुछ भी हो।
श्रीमती दीपिका महेश्वरी सुमन नजीबाबाद बिजनौर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Featured post

सहयोग समिति संस्था क्या है

सहयोग समिति क्या है? सहयोग समिति एक सामाजिक संस्था है जो अधिनियम 21,1860 के अंतर्गत पंजीकृत है पंजीकरण संख्या 2496/2005-2006 है। जि...