शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

रचनाएं- दीपिका माहेश्वरी बिजनोर।

🌹🌹🌹🌹गीत🌹🌹🌹🌹

खिले जब गुल गुलिस्तां  में
तो भँवरों  ने ये फरमाया
हम तुमसे प्यार करते हैं
ये दिल तुमने ही बहलाया

खिले जब गुल गुलिस्तां में .....

सुनकर उनकी बातों को
कलियां भी यूँ  मुस्कायीं
झुका करके वो डाली को
ज़रा थोड़ा सा शर्मायीं
झुकी नज़रों से कहा सब ने
हो तुम रब का ही सरमाया
छू कर प्यार से देखो हमें
तुमने ही तो महकाया

खिले जब गुल गुलिस्तां में.....

बातें एेसी गजब सुनकर
भँवरों ने कहा अरे सखियों
इन शोख़ नज़ारों ने ही
तो दीवाना बनाया है
लूटकर दिल की गलियों को
हमें जीना सिखाया है
सांसों में बस गए जब से
ये दिल भी है मुस्काया
खिले जब गुल गुलिस्ता में........




🌹🌹🌹🌹गीत🌹🌹🌹🌹

उलझे उलझे इन नैनों में उलझी उलझी बतियाँ  ।
ठहरी ठहरी गहरी गहरी लम्बी काली रतियाँ  ।।

खाली जीवन खाली दामन खाली सा मन मेरा,
सोच सोच कर बिखर गया है आतप ने आ घेरा ।
प्यार जरा सा देख लिया तो उमड़ पडीं ये अँखियाँ  ।।
ठहरी -२ गहरी -२............

अश्कों की स्याही से मैनें आज उन्हें संदेश लिखा ,
धुंधली सी यादों में उनका चेहरा मुझको साफ दिखा  ।
आज ख़्वाब में उनसे मेरी हुई रात भर बतियाँ  ।।
ठहरी -२ गहरी-२...........

बहुत याद आता है उनका धीरे से मुस्काना,
चुपके चुपके हौले हौले  मेरे ढिंग आ जाना  ।
थाम के बहियाँ मुझसे करना वो प्यारी सी बतियाँ  ।।
ठहरी -२ गहरी-२.............

ठण्डी ठण्डी रीती रीती बीते अब ये रतिया  ,
पिया बसंती क्यों न भेजे हमें प्रेम की पतिया  ।
अश्कों से लबरेज़ हुई हैं फिर से आज ये अखियाँ  ।।
ठहरी ठहरी गहरी गहरी........

साँझ ढले ही आकर मेरे इन नयनो  में बसना,
सपने में इक झलक दिखा कर खूब जोर से हंसना।
धड़कन जी की और बढ़ाये उनकी प्यारी बतियाँ  ।।
ठहरी ठहरी गहरी गहरी लम्बी काली रतियाँ  ।
उलझे -२ इन नयनो में उलझी -२ बतियाँ  ।।

              दीपिका महेश्वरी'सुमन'

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