रविवार, 11 जुलाई 2021

( प्राकृतिक नियमों के अनुसार मानव विकास की प्रक्रिया के लिए सिद्धांतों का प्रतिपादन

 स्त्री तंत्र की व्याख्या भाग 2


( प्राकृतिक नियमों के अनुसार मानव विकास की प्रक्रिया के लिए सिद्धांतों का प्रतिपादन)


        श्रीमती दीपिका महेश्वरी 'सुमन' अहंकारा
संस्थापिका सुमन साहित्यिक परी नजीबाबाद बिजनौर


अध्याय द्वितीय



सृष्टि की उत्पत्ति के उद्देश्य से, सबसे पहले आदिशक्ति ने अपने सतोगुण से, जिस प्रकाश पुंज की उत्पत्ति कर, नर रूप स्थापित किया था, और उसे विवाह का प्रस्ताव दिया। तब वह विवाह प्रस्ताव, उस नर रूप द्वारा ठुकरा दिए जाने पर, आदिशक्ति ने अपने क्रोध से उसे पत्थर बना दिया। फिर उन्होंने रजोगुण से प्रकाश पुंज की उत्पत्ति कर,उसे नर रूप दिया। उसके भी विवाह प्रस्ताव ठुकरा देने पर, उसे पत्थर बना दिया और वे दोनों पर पत्थरों प्रकाश पुंज आज भी ब्रह्मांड में तैर रहे हैं। इन सब का तात्पर्य यही है कि जो पुरुष स्त्री रूप शक्ति का कहना नहीं मानेगा, उसे पत्थर रुपी जीवन जीना ही पड़ेगा, क्योंकि आदिशक्ति ने नर रूप का प्रकाश पुंज इसलिए ही विकसित किया है कि वह स्त्री जाति की सेवा कर सके। स्त्री की हुकूमत को सर झुका कर माने।


हम अक्सर पढ़ते हैं, अणुओं के संघनन से द्रव्य का निर्माण होता है, और यह बात हमें तब पता चलती है, जब हम पूर्ण रूप से स्वस्थ हो, किताबी ज्ञान अर्जित करने के काबिल होते हैं, परंतु स्त्री ज्ञान का भंडार है, जो अणुओं का संघनन कर मानव की उत्पत्ति करके देती है। यह प्रयोगात्मक उदाहरण सबसे बड़ा उदाहरण है। इस बात का कि, स्त्री समस्त ज्ञान का भंडार है। यह ज्ञान अदिति माता ने स्त्री के अंदर स्वयं प्रवाहित किया है, और जब वह परिपक्व नारी के रूप में परिवर्तित होती है, तो इस ज्ञान की हरपोर स्वयं उसमें खुलती जाती है, परंतु पता नहीं क्यों भारतीय हिंदू व्यवस्था में हर कार्य प्रकृति से उलट रखा गया है? कुछ बातों को सोच कर तो हंसी आती है। भारतीय हिंदू धर्म में क्रोधित काली की पूजा होती है, और स्त्रियों पर हमेशा धैर्य रखने का ज्ञान बघारा जाता है, और तो और उस क्रोधित काली पर मदिरा चढ़ाई जाती है। इसका मतलब यही है कि हिंदू धर्म में स्त्री जाति मदिरापान कर सकती है, परंतु पुरुषों के लिए मदिरापान निषेध है, लेकिन समाज में जो स्थापना की गई वह इससे बिल्कुल उलट है दूसरी बात महादेव शिव शंकर के साथ जितने भी गण मौजूद हैं, और भांग के खुमार को उनका आवरण बताया गया है। वह सब भूतों की श्रेणी में आते, मानव जाति की नहीं।  महादेव शिव शंकर जो स्वयं अदिति माता के अंश हैं, वह तटस्थ सन्यासी के रूप में यानी योग निद्रा में लीन, इस सृष्टि की सुरक्षा कवच के द्वार पालक हैं, और संरक्षक यानी सेवक के रूप में विद्यमान हैं, पार्वती मैया की सेवा में। जो प्रलय के समय अपने सभी नेत्रों को खोल कर संघारकर्ता का रूप धारण कर लेते हैं। आज के समाज पर हावी होती निराशावादीता यह साबित करती है, कि मानव के सृजन में स्त्री रूपी सृजन और विनाशक रूपी पुरुष का जो तालमेल है, उसमें विनाशक तत्व हावी है, क्योंकि स्त्री को यह निर्णय लेने की आजादी ही नहीं रही, कि उसे अपने द्वारा उत्पन्न मानव को किस प्रकार के अणुओं का संघनन कर उत्पन्न करना है, जबकि यह अधिकार सिर्फ और सिर्फ स्त्री का ही होना चाहिए। 


जिस प्रकार स्त्री का धर्म है, इस धरा पर आकर मानव जाति के विकास करने के लिए, उस विकास के हर क्रम को पूरा करना। उसी प्रकार पुरुषों का भी पहला कर्तव्य यही है, कि अपने आप को इस योग्य बनाएं, कि उनके अणुओं के संघनन से स्त्री मानव जाति का विकास कर सके। जो स्त्री के अंश से पैदा हुआ है, यदि उसने मानव विकास के क्रम में स्त्री का सहयोग नहीं किया, तो उसका जीवन निरर्थक है। यदि वह इस योग्य अपने आप को नहीं बना पाया, कि स्त्री खुद उसका चयन कर उसके अणुओं से मानवजाति का विकास करें, तब भी उसका जीवन निरर्थक है। सीखने की आवश्यकता पुरुषों को इसलिए है, कि पुरुष वह तत्व है जिसे स्त्री ने पैदा किया है। जो लोग इस विचार को रखते हैं, कि पैदा करने वाला ईश्वर है और हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है, तो उनके लिए मैं सिर्फ यही कहना चाहूंगी कि आप की देह किस प्रकार तैयार हुई है, वह सिर्फ वह स्त्री जानती हैं, जिसने अणुओं की संघनन से आपकी देह को तैयार किया है, और कोई नहीं। 

इस पर एक प्रश्न और आएगा, जीवन मृत्यु ईश्वर के हाथ है, ईश्वर वह है जिसमें सृजन और विनाश दोनों ही रूप मिले होते हैं, जिसे हम अर्धनारीश्वर कहते हैं। इसमें स्त्री के सृजन रूप और महादेव के विनाश रूप को मिला कर, जो प्रतिमा बनती है, सही मायनों में वह ईश्वर है। उसी तरह अदिति माता की प्रतीक स्त्री जाति को सृजन का कार्य सौंपा है, और वह अपना कार्य परिपूर्ण ढंग से कर रही है।  विनाश रूप महादेव का है,  वही पुरुषों के तत्वों में समाया हुआ है,  यदि उसे यह नहीं पता कि मृत्यु क्या है? इसका मतलब यही है कि उसने अपना कार्य ठीक तरह से नहीं किया, इस संसार में आकर, क्योंकि पुरुष जाति इस पर मंथन कभी करती ही नहीं। उसने अपना प्रमुख कार्य खुद ही नियुक्त कर लिया, स्त्री जाति को नीचे दिखाना, उसका प्रमुख कार्य हो गया। इसलिए वह इस बात को जान नहीं पाया कि मृत्यु क्या है, जबकि वह विनाश रूपक अंश है, तो उसे भली-भांति यह पता होना चाहिए, कि मृत्यु क्या है? हम जब ही सही मायने में हम संसार की स्थापना कर सकेंगे, जिस दिन पुरुष यह समझ गया कि मृत्यु क्या है? तब वह अपने इस संसार को पालने का कर्तव्य प्रमुखता से निभाने लगेगा5 जिस प्रकार शिव शंकर महादेव द्वार पालक की तरह से इस पृथ्वी की प्रलयकाल तक रक्षा करते हैं। ठीक उसी तरह मृत्यु को जानने के पश्चात, पुरुष भी इस संसार में उत्पन्न संतानों को पालना, अपना प्रमुख कर्तव्य समझने लगेगा। जिस दिन पुरुष पिता की जगह पालक कर्तव्य निभाने लगेगा, उस दिन से यह संसार सुचारू रूप से अपनी गति को बहता जाएगा। 


पुरुष तत्व विनाश रूप है, इसलिए ही उसके अनुसरण से मानव जाति विनाश की तरफ जा रही है। स्त्री सृजन का रूप है इसलिए आते हुए स्त्री काल की महत्ता को समझिए और स्त्री जाति का अनुसरण कीजिए तथा निर्माण की ओर अग्रसर होइए।

पुरुष विनाश रूप है, इसलिए स्वयं मृत्यु है परंतु स्त्री सृजन रूप है इसलिए ही वह मृत्यु को जीतकर, मृत्यु के अणुओं का संगठन कर मानव जाति का निर्माण करती है, और मृत्यु को जीत कर ही मानव को जन्म देती है, और मृत्यु के कारणों से बने होने के कारण ही मानव जाति का जीवन चक्र जन्म से शुरू हो मृत्यु पर खत्म होता है, इसलिए यदि चाहते हैं कि यह जीवन चक्र यूं ही चलता रहे, तो पुरुष तत्व को अपने को इस काबिल बनाना होगा, कि स्त्री उसके अणुओं के गठन से मानव जाति का निर्माण कर सकें। 

सभी से एक सवाल... इस संसार में जितने भी प्राणी हैं, जो सांस ले रहे हैं उनकी उत्पत्ति मादा जाति से हुई है, लेकिन उनमें कहीं भी पिता शब्द नहीं है, सिवाय मानव जाति के क्या कोई भी एक व्यक्ति मुझे यह बता सकता है? मानव के अतिरिक्त प्राणियों में पिता तत्व की धारणा क्यों नहीं है? यदि प्रकृति के किसी प्राणी में पिता तत्व की धारणा नहीं है, तो मनुष्य ने फिर किस आधार पर पिता तत्व को प्रमुखता दी और क्यों प्रकृति के नियम को उलट दिया। 


यह संसार केवल सतयुग से प्रारंभ नहीं हुआ, वैदिक काल से भी पहले से प्रारंभ है। तब ना तो मां थी, ना पिता था। फिर मानव योनि में मानव ने बुद्धि लगाकर मां-बाप की परिधि क्यों तय की? यही उसका सबसे बड़ा दोष है। यह संसार असीमित आकाश और धरा से युक्त असीमित संसाधनों से युक्त है, फिर हमने माता-पिता का घेरा बनाकर जो निर्णय लेने की गलती की है, वही मानव जाति के विनाश का सबसे बड़ा कारण है। क्या बिना माता-पिता के घेरे के सृष्टि का विकास नहीं हो रहा था, जो सबसे पहले श्वेतकेतु ऋषि ने माता-पिता का बंधन बना कर परिवार का आवरण ओढ़ाया? क्या कर लिया यह बंधन तय करके हमने? प्रकृति को कुछ काल तक छुपाया जा सकता है, समाप्त नहीं कर सकते आप। आज सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग, कलयुग जीने के बाद आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन स्पर्म बैंक जैसी टेक्नोलॉजी आ गई क्या कर लिया किसी ने?

 "स्पर्म बैंक वो जगह है जहां पर पुरुष का वीर्य 10000 साल तक खराब नहीं होगा।"


 उससे स्त्री बच्चे पैदा कर सकती है, फिर पिता कहां से लाओगे? पुरुष का जीवन नारी से शुरू होकर नारी पर खत्म होता है, इसलिए उसे नारी का कहा मानना है, यही प्राकृतिक नियम है लेकिन उसने नारी पर अपने नियम थोप कर नारी या प्रकृति को रोकने की कोशिश की है, जिसका खामियाजा भुगत रहा है। प्रकृति अपने ऊपर हुए अन्याय को ना तो बर्दाश्त करती है, ना ही कभी अन्याय करने वाले को माफ करती है

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