मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

स्त्री_तंत्र_की_व्याख्या छठा अध्याय_( विवाह पद्धति को समझने से पहले जानने योग्य कुछ बातें)

#स्त्री_तंत्र_की_व्याख्या
छठा अध्याय_( विवाह पद्धति को समझने से पहले जानने योग्य कुछ बातें)



#विवाह_से_पूर्व_वर_वधू_का_न_मिलना

विवाह से पूर्व विवाह करने वाले जोड़े का एक दूसरे से दूर रहना इस विषय पर आज आपका ध्यान केंद्रित कराना चाहती हूं।

इस बिन्दु को समझाने से पहले मैं यहां पर एक बात और ध्यान दिलाना चाहती हूं कि हमारे समाज में युग्म के लिए स्त्री पुरुष का चुनाव या तो मां-बाप के द्वारा किया जाता है या फिर पुरुषों द्वारा किया जाता है, परंतु प्रकृति में ऐसा विधान है कि स्त्री यानी कि मादा अपने जीवन साथी का चुनाव करती है, तो हमें भी इसी बात को नींव बनाकर विवाह पद्धति में आगे बढ़ना है। चुनाव या निर्णय लेने की क्षमता स्त्री में ज्यादा होती है। स्त्री की प्रकृति है ग्रहण करने की, वह उसी पुरुष को ग्रहण करेंगी जो उसके मन में समाहित होगा, तभी हम परमपिता परमात्मा के उस युग्म को प्राप्त कर पाएंगे।

इतनी बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए बच्चों में शुरू से ही इस बात का इन विचारों का हम समावेश करें कि आपको आगे चलकर  जिस युग्म के रूप में उन्हें परिवर्तित होना है उसकी महत्व क्या है? यह हम उन्हें उनके जीवन काल में विवाह पूर्व समय अनुसार बताते रहें ताकि वे अपने धर्म को उनकी विधियों को बहुत अच्छी तरह समझ सकें।

यहां मैं बात कर रही थी स्त्री द्वारा चयन करने की। प्रकृति में मादा को अधिकार है कि वह  सृष्टि के विस्तार के लिए अपने साथी का चुनाव करें, इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि मनुष्य योनि में भी स्त्रियों को अधिकार हो कि वह अपने अनुरूप जीवनसाथी का चुनाव कर उसके साथ युग्म में परिवर्तित होकर सृष्टि का विकास करें।

जो लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते उन्हें यह याद रखना चाहिए कि जो प्रकृति के नियम के विरुद्ध जाता है विनाश की ओर जाता है

 इसका एक उदाहरण दे रही हूं केदारनाथ की विध्वंस कारी प्रलय इस बात का साक्षात उदाहरण है कि प्रकृति के विरुद्ध जाने पर प्रकृति विनाश का नजारा दिखाती है। वहां पर जो प्रलय आई वह इसलिए नहीं आई कि केदारनाथ मोक्ष का द्वार है और वहां सभी उम्र के लोग जाकर मस्ती मजाक और तरह-तरह की सुख-सुविधाओं का भोग कर रहे थे, नहीं क्योंकि प्रकृति की गोद में प्रकृति के बच्चे खेलें  इससे प्रकृति खुश होती है। फलीभूत होती है। इसलिए वह कभी भी बच्चों के खेलने पर प्रलय कारी रूप नहीं धरेगी। इस बात को हमें समझना होगा वहाँ पर महाप्रलय सिर्फ इसलिए आई है की लोगों ने नदी का रास्ता रोक कर वह बिल्डिंग बनाई जिससे नदी को बहने में परेशानी हुई और एक दिन उसने एक धार के साथ सब को बता दिया कि यह मेरा क्षेत्र है और यहां मुझे बहने से कोई नहीं रोक सकता।

अब बात करती हूं विवाह से पूर्व वर वधू का ना मिलना इस तरह की परंपरा प्रचलित है इस पर प्रकाश डाल रही हूं

विवाह पद्धति में इस परंपरा का बहुत ही सुन्दर, सौम्य कारण है कि हम वर वधु की शुद्धि करके अपने धर्म के सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद दिलाने के लिए उनका हवन पूजन करते हैं ताकि उनकी आत्मा शुद्ध हो युग्म परिवर्तित होने के लिए तैयार हो सके।

 एक दूसरे चयन करने के पश्चात एक दूसरे में समाहित होने की लगन उन्हें एक दूसरे के परस्पर आकर्षण पर खींचती है। स्त्री पुरुष का युग्म बनना कोई पाप नहीं है, परंतु विवाह फॉर्मेट, यह पद्धति हमारे धर्म में इसलिए डाली गई है कि जिस युग्म को बनाकर वह परमपिता परमात्मा के उच्चतम शिखर पर पहुंचेंगे उस युग्म को हमारे धर्म में सम्मिलित सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद मिल सके  ताकि उनका आने वाला भविष्य सुदृढ़ हो सके यदि हम अपने बच्चों में कूट-कूट कर देंगे तो वह हमारे किसी भी संस्कार को नकार नहीं सकते। हम जिस धर्म में पैदा हुए हैं उस धर्म से संबंधित सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद लेकर युग्म बनने के क्या फायदे हैं? क्या मायने हैं? यह बात हम अपने बच्चों को परवरिश के दौरान समझाने हैं ताकि वह अपने धर्म को अपनी परंपराओं के महत्व को समझ सके और यदि हमारे पढ़े-लिखे बच्चों को हम सभी कारणों सहित सारी परंपराओं के बारे में ज्ञान दे, तो वह अपनी परंपराओं को मानने से मना नहीं करने के क्योंकि वह भी इतने बुद्धिमान है कि अपना अच्छा बुरा सोच सकें।

उम्र के वे पड़ाव जिन पर हमें अपने बच्चों को यह बताना है कि उनका जन्म सृष्टि के विकास के लिए हुआ है

प्राचीन काल में परंपरा थी जब नव युक्तियां मासिक धर्म की ओर अग्रसर हित होती थी तब उनके प्रथम बार इस श्रेणी में कदम रखने पर घर में उत्सव मनाया जाता था यह संस्कार है हमारे हिंदू धर्म के, जब नवयुवतियां इस श्रेणी में कदम रखती हैं तब हमें उनकी परवरिश के दौरान उन्हें इस चीज की अहमियत बतानी चाहिए। उद्देश्य बताने चाहिए। कार्यो से अवगत कराना चाहिए ताकि वह पढ़ने लिखने के साथ अपने दिमाग को इस बात के लिए भी सेट अप कर लें कि उन्हें सृष्टि का विकास करना है और उसके लिए उन्हें जिस साथी की तलाश करनी है वह उनकी अनुकूल होना चाहिए। इसके लिए उन में चयन शक्ति का तीव्र और तक्षिण होना बहुत जरूरी है। जब हम अपने बच्चों का दिमाग इस तरह से सेटअप करेंगे तब यह भविष्य के युग्म निर्धारण कार्य के लिए परिपक्व होते जाएंगे और इसके लिए जरूरी है कि हमारे सभी संस्कारों जैसे विवाह पद्धति के व्याख्यात्मक विश्लेषण का हमारी शिक्षा पद्धति में जुड़ना।

इसलिए सभी सुधार के साथ-साथ सबसे अहम बिन्दु है शिक्षा पद्धति का बदला जाना। यह तभी हो सकेगा जब हमारी आवाज शिक्षा पद्धति को चयन करने वाले चयनकर्ताओं तक पहुंचे। अगर मेरे लेख आप लोगों को कुछ प्रेरणा देते हैं तो प्लीज इन्हें फॉरवर्ड कीजिए शिक्षा पद्धति के चयनकर्ताओं तक और यह फॉरवर्ड होने चाहिए हमारे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक भी क्योंकि उन लोगों के ही हाथ में है कि वह शिक्षा पद्धति के चयनकर्ताओं को नियुक्त करते हैं। जब उन्हें इस स्थिति को अवगत कराया जाएगा तो वे इस तरह जरूर ध्यान देंगे क्योंकि वह खुद एक समाज सुधारक के रूप में देश में कार्यरत हैं।
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विवाह के सात वचनों से पहले बच्चों को उनके संस्कार में हिंदू धर्म के प्रति आस्था जगाने वाला हर क्रियाकलाप होना चाहिए और वह उसी परिपाटी पर होना चाहिए, जो स्त्री जाति की प्रमुखता पर आधारित हो। अगर इसमें एक भी शब्द ऐसा हुआ जिससे स्त्री जाति को नीचा दिखाने की वाली बात जाहिर हो रही हो तो हमारा बदलाव कोई भी फायदा नहीं देगा।

हिंदू धर्म के नियम परंपराएं उसी अनुसार हमें अपने बच्चों को समझाने है, जो स्त्री जाति की श्रेष्ठता बताएं। क्योंकि स्त्री नियम है स्त्री ग्रहण करती है इसलिए हिंदू धर्म की परिपाटी भी उसी के अनुकूल बताई जाए क्योंकि वास्तविक हिंदू धर्म प्रकृति के ही अनुकूल है।

आजकल के बच्चों के मन में सवाल बहुत उठते हैं और जब तक वह अपने सवालों के उत्तर से संतुष्ट नहीं होते, तब तक वह कोई चीज मानने को तैयार नहीं होते, इसलिए उत्तर तर्कपूर्ण होने चाहिए आपके, आपके बच्चों की संतुष्टि के लिए ताकि उनका हिंदू धर्म के प्रति रुझान बने।

उदाहरण के तौर पर बच्चे कहें कि हम अन्य किसी धर्म के अंदर शादी क्यों नहीं कर सकते तो पहला बिन्दु आप उन्हें यही बताएं कि आप जिस परिवेश में पले बढ़े हुए हो, यदि उससे हटकर धर्म का चुनाव अपने जीवन यापन के लिए करोगे तो वह आपके लिए ही मुसीबत बनेगा क्योंकि आपको आदत नहीं है दूसरे धर्म के अनुसार चलने की, उसका अनुसरण करने की, इसलिए बेहतर जीवन यापन के लिए जीवनसाथी का चुनाव अपने ही धर्म के अनुसार करें अपने कास्ट के आधार पर करें। उन्हें यह भी बताया जाए कि एक ही गोत्र में हमारे यहां शादी नहीं की जाती क्योंकि एक गोत्र के होने के कारण वह गोती भाई माने जाते हैं इसलिए एक गोत्र में भी हम शादी नहीं कर सकते। क्योंकि हमारे धर्म में भाई बहनों का विवाह  निषेध है। यह सब हमें अपने बच्चों को शुरू से ही समझाने होंगे, तब जाकर वह चयन कर पाएंगे अच्छे जीवनसाथी का। उन्हें  यह भी  बताना चाहिए  कि यदि उनका मन मिल रहा है परंतु उनका कास्ट, उनका धर्म, उस परिवेश से अलग है जिस परिवेश में वह खुद पले बढ़े हैं तब भी वे अच्छा जीवन यापन नहीं कर पाएंगे। भविष्य में यह सब शिक्षा हमें अपने अनुरूप अपने बच्चों को देनी चाहिए ताकि उनका दिमाग इस बात के लिए सेट हो सके कि उन्हें क्या चयन करना है। जब यह सब बातें उनके दिमाग में होंगी तब वे अपनी चयन का दायरा सुनिश्चित करके आगे भविष्य के लिए कदम बढ़ाएंगे। उन्हें यह भी समझाएं कि हमें परमपिता का युग्म बनाना है जो कि हमारे अपने हिंदू धर्म के अनुसार ही बनेगा और किसी धर्म के लोग उस परमपिता परमात्मा के युग्म के लिए बनने को तैयार नहीं होंगे क्योंकि भी उसी युग्म की महत्ता को समझ नहीं पाएंगे इस बात को  हमें अपने बच्चों के अंदर बिठाना है और परमपिता परमात्मा के युग्म को ही ध्यान में रखकर हमें संस्कार की परिपाटी तय करनी है अगर वह कोई क्वेश्चन करते हैं तो आप भी उनसे पूछिए कि क्या दूसरे धर्म का साथी आपके उस परमपिता परमात्मा की धारणा को समझ पाएगा?

इस समय हिंदू धर्म की सबसे बड़ी  कमी  यही है कि  इस धर्म में मां और बेटी के प्रति इज्जत सिखाते हैं लेकिन पत्नी के प्रति नहीं  इसलिए सब चीजों के साथ-साथ हिंदू धर्म के पुरुष वर्ग को भी नारियों की भावनाओं को समझने की शिक्षा बचपन से ही देनी चाहिए यह नहीं कि सिर्फ मां की इज्जत करनी है, मां की इज्जत करनी है बड़े होकर तो पूरा जीवन अपनी पत्नी के साथ ही बिताना है और वह पत्नी नहीं है बनने वाले युग्म का आधा भाग है तो मां और बहन की इज्जत के साथ पत्नी की इज्जत की शिक्षा भी उम्र अनुसार पुरुष वर्ग में प्रसारित की जानी चाहिए इस बात की हिंदू धर्म में बहुत कमी है कारण यही है कि प्रकृति के अनुकूल चलने वाला हिंदू धर्म प्रकृति के विपरीत चल रहा है। यदि हमें इसका प्रकृति के अनुकूल ढलान बनाना है तो हमें स्त्री और पुरुष दोनों वर्गों की परवरिश प्रकृति के अनुकूल करनी होगी।

 जो लोग मेरी इन बातों से संदेहात्मक स्थिति या जटिलता की अवस्था में जा रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि समाज हमेशा नियमों के दायरे में चलता है और परिवार के भी नियम निर्धारण की है व्यवस्था की जा रही है तथा विवाह पद्धति वचनों के अनुसार तय की गई है हमारे धर्म में इसलिए मेरे लिखी हुई एक एक बात को गौर से पढ़ें दो-तीन बार पढ़ें  क्योंकि मैंने कोई भी पॉइंट ऐसा नहीं डाला जिससे स्त्री जाति के  अपमान का दायरा बने और जो लोग  पुरुष प्रधान समाज के दायरे में ही चलकर  इन बातों को समझेंगे तो वह कुछ समझ नहीं पाएंगे उन्हें अपनी सोच बदलनी होगी  तभी हम नवनिर्माण की तरफ बढ़ पाएंगे।

कल से विवाह के सात वचन की व्याख्या की जाएगी।

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