#स्त्री_तंत्र_की_व्याख्या
अष्टम अध्याय_( विवाह तीसरे और चौथे वचन की समीक्षा सहित व्याख्या)
लेखिका - दीपिका माहेश्वरी बिजनोर
आज सात वचनों में से तीसरे वचन का अर्थ सहित महत्व ::
#3. #जीवनम #अवस्थात्रये #पालनां #कुर्यात
#वामांगंयामितदा #त्वदीयं #ब्रवीति #कन्या #वचनं #तृतीयं!!
(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे यह वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूं।)
प्राचीन काल में जब आर्थिक स्वावलंबी स्त्रियां नहीं होती थी तब यह वचन बनाया गया था और तब भी आर्थिक रूप से परतंत्रता का वचन नहीं दिया गया था इसमें तीनों अवस्थाओं में पालन करने का वचन दिया था पुरुष ने परंतु आज अपनी दंभी मर्यादा के चलते इस वचन का अर्थ ही बदल दिया है स्त्री की की आर्थिक परतंत्रता को पुरुष अपना आभूषण मानते हैं और अपने अभिमान का साधन समझते हैं इसकी व्याख्या में समीक्षा के दौरान करूंगी।
#तीसरे #वचन #की #समीक्षा
तीसरे वचन में पुरुष स्त्री को वचन देता है कि वह उसका युवावस्था प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में पालन पोषण करेगा। उसके जीवन काल की सारी जरूरतें पूरी करेगा। उसे आर्थिक मजबूती प्रदान करेगा। यह वचन पुरुष द्वारा स्त्री को दिया जाता है, परंतु इस वचन में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि भरण पोषण की जिम्मेदारी सौंपते हुए स्त्री उसे अपनी आर्थिक परतंत्रता सौंप रही है। अभी तक के सारे वचन पुरुष द्वारा दिए गए हैं स्त्री को। स्त्री ने कोई भी वचन पुरुष को नहीं दिया है।
लेकिन आज के परिपेक्ष में इस वचन के मायने बदल दिए गए हैं। इस वचन को आर्थिक परतंत्रता में बदलकर अपने अभिमान का आभूषण बनाकर मर्यादा का जामा पहना दिया है पुरुष वर्ग ने, जिसके चलते सभी पुरुष मर्यादा के जोड़े में आर्थिक परतंत्रता स्त्री पर लाद देते हैं। यह वचन जब बना था जब स्त्रियां आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं थी, लेकिन तब भी आर्थिक परतंत्रता का जिक्र इस वचन में कहीं से कहीं तक नहीं है। जबकि आज स्त्रियां आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो गई हैं, तब भी पुरुष अपने दंभ के आगे उन्हें घर से निकलने की इजाजत नहीं देते। काम करने की इजाजत नहीं देते, जिसके सापेक्ष में उन्होंने यह कहावत बना दी कि स्त्री को उतना ही खर्च करना चाहिए जितना उसका पति कमाए और इस बात ने उस महत्वपूर्ण बात को भुला दिया कि हर प्राणी हर मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक का खर्चा लिखवा कर लाता है। यदि आधुनिक नजरिए से देखें हर एक सिंगल व्यक्ति का ₹10000 महीना का खर्चा है यदि उसे खाना पानी कपड़े मिल रहे हैं तब भी इसलिए स्त्रियों की स्थिति बहुत ज्यादा भयानक है क्योंकि एक तो उन्हें आर्थिक स्वावलंबन नहीं दिया जाता। दूसरे उन्हें आने-जाने की स्वतंत्रता नहीं। उन्हें कमाने की स्वतंत्रता नहीं बस जो पति लाए उसमें गुजर-बसर करना है क्योंकि यह पुरुष वर्ग के दंभ का आवरण है।
कहीं-कहीं तो स्थिति इतनी भयानक है कि स्त्रियों को अपने खर्चे के लिए कुछ भी नहीं दिया जाता सिर्फ खाना पानी कपड़े के अलावा आधी से ज्यादा स्त्रियां अपने पसंद की चीज खरीदें बिना ही दुनिया छोड़ देती हैं, क्योंकि जो पुरुष वर्ग इस खेमे में आता है उसकी मानसिकता यही होती है कि स्त्री पैरों की जूती है उसे दासी बना कर रखना चाहिए। यदि उसे आर्थिक स्वावलंबन दे दिया गया तो वह हमारे सर पर चढ़कर नाचेगी। विवाह के वक्त आर्थिक भरण पोषण का वचन देने के बावजूद स्त्रियों से गुलामी कराई जाती है जबकि स्त्री ने आपको कोई वचन नहीं दिया पहले लोग पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन अब लोग पढ़े लिखे हैं तकरीबन 50 साल से पढ़े लिखे हैं फिर भी समाज ने अनपढ़ों की तरह वचनों को तहस-नहस किया और हमने कई बेहतरीन ज्ञानवान महिलाएं खो दी उनका ज्ञान खो दिया पुरुष वर्ग के दंभ के चलते।
जब स्त्री ने अपनी आर्थिक परतंत्रता आपके हाथों में सौंपी ही नहीं तो किस हक से आप उसे दासी बना कर गुलामी करवा रहे हैं, जबकि आपने वचन दिया कि आप उसका भरण पोषण करेंगे महारानी की तरह। फिर समाज के नियम निर्धारण से स्त्री दासी कैसे बन गई? अभी तो वचन खंडित ही हुए थे अब वचन उल्टे भी होने लगे हैं इस एकवचन के पैमाने पर 100% विवाह खंडित हो जाएंगे।
#विवाह #का #चौथा #वचन
4. #कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य #कर्तु #प्रतिज्ञां #यदि #कातं #कुर्या:
#वामांगमायामि #तदा #त्वदीयं #ब्रवीति #कन्या #वचनं #चतुर्थ:।।
(कन्या चौथा वचन यह मांगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जब कि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूं।)
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उत्तरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृष्ट करती है। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए, जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।
#चौथे #वचन #की #समीक्षा
यह वचन सिद्ध करता है कि पुरुष का परिवार तभी बनता है, जब वह स्त्री से विवाह करके अपने वंश की बेल को आगे बढ़ाता है और परिवार बनाता है। इससे पहले वह जिस परिवार में रहता है, वह उसके माता-पिता का बनाया हुआ परिवार है, परंतु इसके विरुद्ध लोगों ने अपने मन में यह धारणा पाल रखी है कि जिस प्रकार स्त्री अपने सगे संबंधियों को छोड़कर आती है वैसे ही पुरुष भी अपना परिवार एक अनजान स्त्री के हाथों में सौंप देता है, परंतु यहां गौर करने वाली बात यह है कि वचन देते समय पुरुष स्वीकार करता है कि अभी तक मैं परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त था विवाह होने के पश्चात उसे परिवार के पूरे दायित्व निभाने होंगे ऐसी प्रतिज्ञा करता है पुरुष।
मजे की बात यह है की पुरुष वर्ग में कुछ ऐसी संकीर्ण मानसिकता के पुरुष होते हैं, जो परिवार के दायित्व की पूर्ति करने की प्रतिज्ञा तो पत्नी को देते हैं, परंतु उनके लिए सबसे पहले समाज में अपनी इज्जत का दायरा आता है, फिर माता-पिता का दायरा आता है, उसके बाद परिवार के बच्चों का दायरा आता है, तब कहीं जाकर पत्नी का नंबर आता है। और यह नंबर वह अपने लिस्ट में नहीं भी रखते तब भी उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को कोई फर्क नहीं पड़ता।
यह सोच बहुत अचंभित करने वाली है कि जिस पत्नी के साथ परिवार बसाया परिवार के दायित्व की पूर्ति की उसके ही खर्चे परिवार के दायित्वों में नहीं रखे जाते, क्योंकि मानसिकता में यह बात कूट-कूट कर भरी हुई है कि पत्नी को उतनी ही रुपए में खर्चा चलाना चाहिए जितने जो पति कमा कर लाता है तो भाई यह प्रतिज्ञा ही क्यों ली जाती है। जब इन्हें मानना ही नहीं है किसी भी तरह से तो इन वचनों का फायदा ही क्या है? क्योंकि यदि ऐसी ही मानसिकता से जीवन पत्नी के साथ व्यतीत किया जाता है, तो विवाह निश्चित रूप से खंडित है। तो फिर यह ढोंग और आडंबर क्यों और किस लिए? इन बातों को सोचना जरूरी है परिवार के निर्धारण के लिए।
अष्टम अध्याय_( विवाह तीसरे और चौथे वचन की समीक्षा सहित व्याख्या)
लेखिका - दीपिका माहेश्वरी बिजनोर
आज सात वचनों में से तीसरे वचन का अर्थ सहित महत्व ::
#3. #जीवनम #अवस्थात्रये #पालनां #कुर्यात
#वामांगंयामितदा #त्वदीयं #ब्रवीति #कन्या #वचनं #तृतीयं!!
(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे यह वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूं।)
प्राचीन काल में जब आर्थिक स्वावलंबी स्त्रियां नहीं होती थी तब यह वचन बनाया गया था और तब भी आर्थिक रूप से परतंत्रता का वचन नहीं दिया गया था इसमें तीनों अवस्थाओं में पालन करने का वचन दिया था पुरुष ने परंतु आज अपनी दंभी मर्यादा के चलते इस वचन का अर्थ ही बदल दिया है स्त्री की की आर्थिक परतंत्रता को पुरुष अपना आभूषण मानते हैं और अपने अभिमान का साधन समझते हैं इसकी व्याख्या में समीक्षा के दौरान करूंगी।
#तीसरे #वचन #की #समीक्षा
तीसरे वचन में पुरुष स्त्री को वचन देता है कि वह उसका युवावस्था प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था में पालन पोषण करेगा। उसके जीवन काल की सारी जरूरतें पूरी करेगा। उसे आर्थिक मजबूती प्रदान करेगा। यह वचन पुरुष द्वारा स्त्री को दिया जाता है, परंतु इस वचन में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि भरण पोषण की जिम्मेदारी सौंपते हुए स्त्री उसे अपनी आर्थिक परतंत्रता सौंप रही है। अभी तक के सारे वचन पुरुष द्वारा दिए गए हैं स्त्री को। स्त्री ने कोई भी वचन पुरुष को नहीं दिया है।
लेकिन आज के परिपेक्ष में इस वचन के मायने बदल दिए गए हैं। इस वचन को आर्थिक परतंत्रता में बदलकर अपने अभिमान का आभूषण बनाकर मर्यादा का जामा पहना दिया है पुरुष वर्ग ने, जिसके चलते सभी पुरुष मर्यादा के जोड़े में आर्थिक परतंत्रता स्त्री पर लाद देते हैं। यह वचन जब बना था जब स्त्रियां आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं थी, लेकिन तब भी आर्थिक परतंत्रता का जिक्र इस वचन में कहीं से कहीं तक नहीं है। जबकि आज स्त्रियां आर्थिक रूप से स्वावलंबी हो गई हैं, तब भी पुरुष अपने दंभ के आगे उन्हें घर से निकलने की इजाजत नहीं देते। काम करने की इजाजत नहीं देते, जिसके सापेक्ष में उन्होंने यह कहावत बना दी कि स्त्री को उतना ही खर्च करना चाहिए जितना उसका पति कमाए और इस बात ने उस महत्वपूर्ण बात को भुला दिया कि हर प्राणी हर मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक का खर्चा लिखवा कर लाता है। यदि आधुनिक नजरिए से देखें हर एक सिंगल व्यक्ति का ₹10000 महीना का खर्चा है यदि उसे खाना पानी कपड़े मिल रहे हैं तब भी इसलिए स्त्रियों की स्थिति बहुत ज्यादा भयानक है क्योंकि एक तो उन्हें आर्थिक स्वावलंबन नहीं दिया जाता। दूसरे उन्हें आने-जाने की स्वतंत्रता नहीं। उन्हें कमाने की स्वतंत्रता नहीं बस जो पति लाए उसमें गुजर-बसर करना है क्योंकि यह पुरुष वर्ग के दंभ का आवरण है।
कहीं-कहीं तो स्थिति इतनी भयानक है कि स्त्रियों को अपने खर्चे के लिए कुछ भी नहीं दिया जाता सिर्फ खाना पानी कपड़े के अलावा आधी से ज्यादा स्त्रियां अपने पसंद की चीज खरीदें बिना ही दुनिया छोड़ देती हैं, क्योंकि जो पुरुष वर्ग इस खेमे में आता है उसकी मानसिकता यही होती है कि स्त्री पैरों की जूती है उसे दासी बना कर रखना चाहिए। यदि उसे आर्थिक स्वावलंबन दे दिया गया तो वह हमारे सर पर चढ़कर नाचेगी। विवाह के वक्त आर्थिक भरण पोषण का वचन देने के बावजूद स्त्रियों से गुलामी कराई जाती है जबकि स्त्री ने आपको कोई वचन नहीं दिया पहले लोग पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन अब लोग पढ़े लिखे हैं तकरीबन 50 साल से पढ़े लिखे हैं फिर भी समाज ने अनपढ़ों की तरह वचनों को तहस-नहस किया और हमने कई बेहतरीन ज्ञानवान महिलाएं खो दी उनका ज्ञान खो दिया पुरुष वर्ग के दंभ के चलते।
जब स्त्री ने अपनी आर्थिक परतंत्रता आपके हाथों में सौंपी ही नहीं तो किस हक से आप उसे दासी बना कर गुलामी करवा रहे हैं, जबकि आपने वचन दिया कि आप उसका भरण पोषण करेंगे महारानी की तरह। फिर समाज के नियम निर्धारण से स्त्री दासी कैसे बन गई? अभी तो वचन खंडित ही हुए थे अब वचन उल्टे भी होने लगे हैं इस एकवचन के पैमाने पर 100% विवाह खंडित हो जाएंगे।
#विवाह #का #चौथा #वचन
4. #कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य #कर्तु #प्रतिज्ञां #यदि #कातं #कुर्या:
#वामांगमायामि #तदा #त्वदीयं #ब्रवीति #कन्या #वचनं #चतुर्थ:।।
(कन्या चौथा वचन यह मांगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिंता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जब कि आप विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूं।)
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उत्तरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृष्ट करती है। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए, जब वह अपने पैरों पर खड़ा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।
#चौथे #वचन #की #समीक्षा
यह वचन सिद्ध करता है कि पुरुष का परिवार तभी बनता है, जब वह स्त्री से विवाह करके अपने वंश की बेल को आगे बढ़ाता है और परिवार बनाता है। इससे पहले वह जिस परिवार में रहता है, वह उसके माता-पिता का बनाया हुआ परिवार है, परंतु इसके विरुद्ध लोगों ने अपने मन में यह धारणा पाल रखी है कि जिस प्रकार स्त्री अपने सगे संबंधियों को छोड़कर आती है वैसे ही पुरुष भी अपना परिवार एक अनजान स्त्री के हाथों में सौंप देता है, परंतु यहां गौर करने वाली बात यह है कि वचन देते समय पुरुष स्वीकार करता है कि अभी तक मैं परिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त था विवाह होने के पश्चात उसे परिवार के पूरे दायित्व निभाने होंगे ऐसी प्रतिज्ञा करता है पुरुष।
मजे की बात यह है की पुरुष वर्ग में कुछ ऐसी संकीर्ण मानसिकता के पुरुष होते हैं, जो परिवार के दायित्व की पूर्ति करने की प्रतिज्ञा तो पत्नी को देते हैं, परंतु उनके लिए सबसे पहले समाज में अपनी इज्जत का दायरा आता है, फिर माता-पिता का दायरा आता है, उसके बाद परिवार के बच्चों का दायरा आता है, तब कहीं जाकर पत्नी का नंबर आता है। और यह नंबर वह अपने लिस्ट में नहीं भी रखते तब भी उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को कोई फर्क नहीं पड़ता।
यह सोच बहुत अचंभित करने वाली है कि जिस पत्नी के साथ परिवार बसाया परिवार के दायित्व की पूर्ति की उसके ही खर्चे परिवार के दायित्वों में नहीं रखे जाते, क्योंकि मानसिकता में यह बात कूट-कूट कर भरी हुई है कि पत्नी को उतनी ही रुपए में खर्चा चलाना चाहिए जितने जो पति कमा कर लाता है तो भाई यह प्रतिज्ञा ही क्यों ली जाती है। जब इन्हें मानना ही नहीं है किसी भी तरह से तो इन वचनों का फायदा ही क्या है? क्योंकि यदि ऐसी ही मानसिकता से जीवन पत्नी के साथ व्यतीत किया जाता है, तो विवाह निश्चित रूप से खंडित है। तो फिर यह ढोंग और आडंबर क्यों और किस लिए? इन बातों को सोचना जरूरी है परिवार के निर्धारण के लिए।

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